Monday, January 18, 2010

The Guide dog and the lesser humans

It happened on the city train today while I was coming back from work. A blind man with his guide dog boarded the train. The dog was a Labrador retriever as the guide dogs are mostly. And may be because i had all the time in the world to observe this dog, I found something very unique about this dog. It had a very calm disposition almost like a monk. This was a moving train with passengers coming in and moving out but the dog was calm, cool and contemplative with a serene expression on its face. Not even once did it look at the other passengers or displayed any expression or emotion or took a sneak a peek out of the windows. I have seen dogs in moving trucks, cars etc and they are up on all fours, tongue sticking out and tail wagging and here was one before me an absolute contrast.
While I was comparing and admiring this dog came in a young playful couple. They started to pet the dog, play with it oblivious of the discomfort it created to the blind guy whom the dog serviced. The dog probably responded a bit but mostly tried to ignore them. Obviously it created a difficult situation for the blind man who totally depended on the dog. I was quite irritated at seeing this but did not wanted to create a scene in the busy train. To me the dog behaved excellently and this couple definitely like lesser human beings.

Tuesday, January 12, 2010

जो बीत गई सो बात गई

जो बीत गई सो बात गई
जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है

जो बीत गई सो बात गई
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है

जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है

जो बीत गई सो बात गई
मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है

जो बीत गई सो बात गई।।

~ हरिवंश राय बच्चन